दो साल में 12227 किसानों ने की आत्महत्या, सबसे ज्यादा महाराष्ट्र में, जानिए अन्य राज्यों का हाल -

कृषि आय के मामले में पहले नंबर पर आने वाले पंजाब में भी किसानों की आत्महत्या का सिलसिला नहीं रुक रहा है. हालांकि, हरियाणा और बिहार में पिछले दो साल में एक भी केस नहीं आया है.



 




किसानों की आमदनी दोगुनी करने की बहस के बीच पिछले दो साल (2018, 2019) में 12,227 अन्नदाताओं ने आत्महत्या (Farmers Suicide) कर ली है. इनमें 5230 किसान तो अकेले महाराष्ट्र से थे. सत्ता चाहे बीजेपी, कांग्रेस की हो या फिर शिवसेना और वाईएसआर व टीआरएस की, कृषक आत्महत्या को रोकने में सभी विफल रहे हैं. हालांकि, कुछ राज्यों की सरकारों ने किसानों के लिए अच्छे काम किए हैं जिसका परिणाम आत्महत्या की कमी के रूप में दिखाई दे रहा है. केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के हवाले से इसका आंकड़ा दिया है. कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक किसानों की उपज का दाम तय नहीं होगा किसानों की बदहाली कम नहीं होगी.

पिछले 2 साल में महाराष्ट्र, तेलंगाना और कर्नाटक में किसानों की आत्महत्या के सबसे ज्यादा मामले रिपोर्ट हुए हैं. कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि खेती की लागत और साल दर साल कर्ज का मर्ज बढ़ने से ऐसी नौबत पैदा हो रही है. कृषि आत्महत्या के सबसे ज्यादा मामले विदर्भ और मराठवाडा में हैं, जहां किसान कपास की खेती के दुष्चक्र में फंसा हुआ है. अब इन किसानों को कपास के चक्रव्यूह से निकालकर सोयाबीन की खेती पर शिफ्ट होने के लिए प्रेरित किया जा रहा है.

कृषि में अग्रणी पंजाब, हरियाणा का हाल

पंजाब और हरियाणा कृषि के मामले में सबसे संपन्न हैं. दोनों में सरकारें न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर सबसे ज्यादा खरीद करती हैं. इसके बावजूद पंजाब में आत्महत्या का रेट कम नहीं हो रहा है. हालांकि, हरियाणा ने इसे काफी कंट्रोल कर लिया है. पंजाब में 24 महीने में 471 किसानों ने मौत को गले लगा लिया है. जबकि यहां हर किसान के पास औसतन 3.62 हेक्टेयर खेत है. फिर किसान क्यों तनाव में हैं?

‘खुशहाल’ पंजाब की ‘बदहाली’

दरअसल, पंजाब प्रति किसान सबसे ज्यादा कर्ज वाले सूबों में शामिल है. यहां प्रति किसान परिवार औसत बकाया कर्ज राष्ट्रीय औसत से अधिक है. देश के किसानों पर औसतन 47-47 हजार रुपये का कर्ज है. जबकि पंजाब में यह 1,19,500 रुपये है. यहां पर हर किसान पर 17924 रुपये का साहूकारों से लिया गया कर्ज चढ़ा हुआ है.

पंजाब के किसानों की औसत सालाना आय देश में सबसे अधिक है. यहां हर किसान सालाना 2,30,905 रुपये कमाता है. लेकिन इसके पीछे का सच यह भी है कि 80 फीसदी से अधिक किसान कर्जदार हैं. किसान नेता भूपिंदर सिंह मान कहते हैं “मुझे लगता है कि पंजाब में ज्यादातर किसानों की जमीन बैंकों के पास गिरवी है. पहले एक एकड़ पर 10 हजार रुपये का लोन मिलता था. अब 3 लाख मिल रहा है. लोन के बिना किसानों का सर्वाइवल नहीं है.”

दूसरी ओर हरियाणा प्रति किसान आय के मामले में दूसरे नंबर पर है. यहां किसानों की औसत सालाना कमाई 1,87,225 रुपये है. साल 2018 और 2019 में एक भी किसान ने आत्महत्या नहीं की है. कृषि आय के मामले में बिहार अंतिम पायदान पर है. लेकिन, यहां भी पिछले दो साल में किसी किसान आत्महत्या नहीं की है.

जरूरत से अधिक कृषि मशीनरी और खाद का इस्तेमाल

पंजाब में जरूरत से कहीं ज्यादा कृषि मशीनरी है. अकेले इसी राज्य में देश के 11 फीसदी ट्रैक्टर हैं. यहां सिर्फ 42.90 लाख हेक्टेयर जमीन (देश की सिर्फ 2.7 फीसदी खेती योग्य जमीन) पर खेती होती है. कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक यहां जरूरत से अधिक ट्रैक्टर हैं. मुश्किल से दो लाख ट्रैक्टरों की जरूरत है. इससे भी कर्ज बढ़ रहा है. इसका तनाव किसानों की जान ले रहा है.

आखिर महाराष्ट्र में क्यों होती हैं सबसे ज्यादा कृषक आत्महत्या?

महाराष्ट्र काफी धनी राज्य माना जाता है. लेकिन किसानों की सबसे ज्यादा दुर्दशा यहीं पर दिखाई देती है. पिछले दो साल में ही यहां के 5230 अन्नदाता आत्महत्या कर चुके हैं. अखिल भारतीय किसान सभा के राज्य सचिव डॉ. अजीत नवले ने इस सवाल का जवाब दिया है. नवले कहते हैं, “मराठवाडा और विदर्भ कृषक आत्महत्या के लिए कुख्यात है. यह नॉन इरीगेटेड एरिया है, जहां ड्राई बीटी कॉटन की फसल ली जाती है”.

“यह किसानों के लिए घाटे का सौदा है. सरकार इसकी नाम मात्र की खरीद करती है. इसलिए किसान बाजार के हवाले है. बाजार की नीतियां किसानों का शोषण कर रही हैं. इसकी एमएसपी 5515 रुपये प्रति क्विंटल है , लेकिन बाजार से उसे 3000 रुपये का औसत दाम मिलता है. जबकि कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP) की खुद की रिपोर्ट बताती है कि प्रति क्विंटल कॉस्ट 3676 रुपये आती है. इससे किसानों पर कर्ज बढ़ता जाता है और अंत में वो तनाव में आकर अपना जीवन खत्म करने का फैसला कर लेता है. सरकार बदलती रहती है लेकिन किसान की किस्मत नहीं बदलती.”

आखिर इसका समाधान क्या है?

डॉ. अजीत नवले कहते हैं, “काटन की खरीद एमएसपी के रेट पर सुनिश्चित की जाए. इसका लागत मूल्य घटाने के लिए सरकार सहयोग दे और पुराने कर्जों से किसानों को मुक्त करे. अगर महाराष्ट्र में भी हरियाणा की तरह होने लगे तो यहां भी किसानों का स्ट्रेस कम हो जाएगा. महाराष्ट्र में 20-25 फीसदी ही कपास की सरकारी खरीद होती है. अब कई कॉटन किसान कपास छोड़कर सोयाबीन की खेती कर रहे हैं. खुले बाजार में कॉटन का रेट 8000 रुपये क्विंटल हो जब जाकर किसानों का भला हो सकता है.”

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  1. डॉ. अजीत नवले कहते हैं, “काटन की खरीद एमएसपी के रेट पर सुनिश्चित की जाए. इसका लागत मूल्य घटाने के लिए सरकार सहयोग दे और पुराने कर्जों से किसानों को मुक्त करे. अगर महाराष्ट्र में भी हरियाणा की तरह होने लगे तो यहां भी किसानों का स्ट्रेस कम हो जाएगा. महाराष्ट्र में 20-25 फीसदी ही कपास की सरकारी खरीद होती है. अब कई कॉटन किसान कपास छोड़कर सोयाबीन की खेती कर रहे हैं. खुले बाजार में कॉटन का रेट 8000 रुपये क्विंटल हो जब जाकर किसानों का भला हो सकता है.”

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