दलित, आदिवासी और मुस्लिम- बाहर कम, जेल में ज्यादा: NCRB डेटा

2015 के बाद बंद हुई थी जाति आधारित रिपोर्ट
नई दिल्ली। केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन काम करने वाले राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो ने साल 2019 के जेल संबंधित आंकड़े जारी कर दिए हैं। 
इन आंकड़ों के जेलों में दलित, मुस्लिम और आदिवासी कैदियों की संख्या देश में दूसरे जाति समूहों के मुकाबले उनकी जनसंख्या के अनुपात में कहीं अधिक है। वहीं मुस्लिम समुदाय में विचाराधीन कैदियों की संख्या जेल में बंद दोषी कैदियों से अधिक है। 2011 की जनगणना के अनुसार अनुसूचित जाति की आबादी देश की कुल जनसंख्या का 16 प्रतिशत है जबकि एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक जेल में बंद कुल कैदियों में 21.7% प्रतिशत इस जाति समूह से हैं। वहीं ऐसे कैदी जिनका मामला कोर्ट में चल रहा है यानि जो विचाराधीन हैं उनमें दलित कैदी कुल संख्या का 21 प्रतिशत हैं।

2015 के बाद बंद हुई थी जाति आधारित रिपोर्ट वहीं अगर आदिवासी समुदाय की हालत भी कुछ ऐसी ही है। अनुसूचित जनजाति में आने वाले कैदियों में दोषी 13.6 प्रतिशत हैं जबकि 10.5 प्रतिशत कैदी विचाराधीन हैं। 

अनुसूचित जनजाति की कुल आबादी देश की जनसंख्या की 8.6 प्रतिशत है। बता दें कि 2015 में विवादास्पद रिपोर्ट के बाद एनसीआरबी ने जाति और धर्म का उल्लेख करना बंद कर दिया था। 2015 की एनसीआरबी की रिपोर्ट में बताया गया था कि देश में 55 प्रतिशत कैदी दलित, आदिवासी और मुस्लिम समुदाय से थे। जिसके बाद सरकार पर इन समुदायों के साथ भेदभाव का आरोप लगने लगा था। मुस्लिम समुदाय के विचाराधीन कैदी ज्यादा अब बात करते हैं मुस्लिम समुदाय की। देश की आबादी में मुस्लिमों की संख्या तो 14.2 प्रतिशत है लेकिन जेल में बंद कुल दोषी कैदियों में मुसलमान कैदी 16.2 प्रतिशत हैं। विचाराधीन कैदियों में कुल मुस्लिम कैदियों का प्रतिशत 18.7% है। खास बात यह है कि विचाराधीन मुसलमान कैदियों की संख्या जेल में बंद कुल दोषी मुसलमान कैदियों की तुलना में अधिक है।

 इन आंकड़ों की अगर ओबीसी और दूसरे समुदाय से तुलना करें तो पहली नजर में ही हाशिए पर डाले गए समाज की स्थिति को समझा देते हैं। एनएसएसओ के 2006 में जारी आंकड़ों में ओबीसी और दूसरे समुदाय का दोषी और विचाराधीन कैदियों का प्रतिशत लगभग क्रमशः 35 और 34 था। वहीं हिंदुओं और दूसरे धर्मों की उच्च जातियों में 13 प्रतिशत दोषी और 16 प्रतिशत अंडरट्रायल कैदी हैं। सामान्य वर्ग की आबादी देश की कुल जनसंख्या की 19.6 प्रतिशत है।

2015 के आंकड़ों से तुलना 2015 के आंकड़ों से अगर तुलना करें तो इस बार विचाराधीन कैदियों की संख्या कम हुई है जबकि दोषी कैदियों की संख्या बढ़ी है। 2015 में मुस्लिम कुल विचाराधीन का 20.9 और दोषी कैदियों का 15.8 प्रतिशत थे जबकि 2019 में विचाराधीन 18.7 और 16.6 प्रतिशत है। वहीं एससी/एसटी समुदाय के लिए पिछले पांच साल में स्थितियां कुछ खास नहीं बदली हैं। 

2015 में दलित कुल कैदियों की संख्या का 21 प्रतिशत थे जो कि 2019 के लगभग इतनी ही है। अनुसूचित जाति की संख्या भी ठीक वैसी ही है। 2015 में 13.7% थी और 2015 में 13.6% है। हालांकि अनूसूचित जाति के विचाराधीन कैदियों की संख्या कम (2006 में 12.4% और 2019 में 10.5%) हुई है। प्रदेश में सबसे अधिक कैदी विचाराधीन दलित कैदी उत्तर प्रदेश (17995) से हैं। इसके बाद बिहार (68430 और पंजाब (68310) का नंबर है। 

वहीं दोषी दलित कैदियों में भी उत्तर प्रदेश 6,143 कैदियों के साथ पहले स्थान पर है। अनुसूचित जनजाति के विचाराधीन कैदियों की संख्या मध्यप्रदेश (5,894) में सबसे ज्यादा है जबकि उत्तर प्रदेश दूसरे नंबर (3,954) पर है। दोषी दलित कैदियों की संख्या सबसे अधिक मध्यप्रदेश में है जहां 5,303 दोषी दलित कैदी जेल में बंद हैं। क्यों है इन समुदायों की संख्या जेलों में ज्यादा ? रिपोर्ट को लेकर सिविल सोसायटी समूहों का कहना है कि इसका मतलब ये नहीं कि इन जाति या समुदाय के लोगों में अपराध ज्यादा है। इसे लेकर न्याय व्यवस्था पर भी सवाल उठते हैं। हमारी न्याय व्यवस्था गरीबों के हक में नहीं है। गरीब लोग छोटे-मोटे अपराधों में भी जमानत नहीं ले पाते। कई बार तो जमानत मिलने के बाद भी खराब आर्थिक स्थिति के कारण जमानत न दे पाने के चलते उनकी रिहाई नहीं हो पाती। 

पिछले डेढ़ दशक से मीडिया में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार अशोक दास फिलहाल "दलित दस्तक" मासिक पत्रिका के संचालक और संपादक हैं। अशोक दास वन इंडिया हिंदी से बातचीत में कानूनी सलाह न मिल पाने को इसकी वजह बताते हैं। अशोक कहते हैं 'आप देखेंगे तो पाएंगे कि जो दलित, आदिवासी जेलों में हैं उनमें अधिकतर बहुत ही छोटे-छोटे अपराध के आरोप में बंद हैं। वे लोग बेहतर वकील नहीं कर पाते और सालों-साल जेलों में पड़े रहते हैं। 

कई बार तो ऐसा देखा गया है कि जो अपराध किया गया होता है उसकी जो सजा मिलनी होती है उससे अधिक समय तक वे जेलों में बिता चुके होते हैं। ये भारतीय न्याय व्यवस्था पर सवाल है कि सरकारें या न्याय पालिका उनको बेहतर कानूनी सलाह मुहैया कराने में असफल रही है।'





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