कंगना जातिवाद मिटाने की जगह आरक्षण हटाने की बात करती हैं, सवर्ण परिवारों में यही सिखाया जाता है

 

बाकी जातियों के लोगों को एससी-एसटी या ओबीसी कटेगरी के अंदर रखा जाता है और सवर्ण जातियां जनरल कास्ट बन जाती हैं. सवर्णों के लिए जाति एक ड्रेस है, जिसे पहना और उतारा जा सकता है.

कंगना रानौत और जाति का सारा विवाद एक किताब के बारे में किए गए ट्विट से शुरू हुआ. जबकि बात किताब पर होनी चाहिए थी. जैसा कि कहा जाता है कि लोग खत यानी चिट्ठी देखकर मजमून यानी अंदर क्या है ये पढ़ लेते हैं, वैसा ही अफ्रीकन अमेरिकन पत्रकार और लेखक इसाबेल विलकिरसन की किताब ‘Caste: The Origins of Our Discontents’ के बारे में भारत में हो रहा है. इस चर्चा के केंद्र में किताब नहीं, एक ट्वीट है.

ट्वीट में सिर्फ ये लिखा गया था कि इस किताब की दुनिया में काफी चर्चा हो रही है, लेकिन भारत में इसे लेकर चुप्पी है. इस ट्वीट में जाति व्यवस्था के पक्ष या विपक्ष में कोई टिप्पणी नहीं है. इस ट्वीट में आरक्षण शब्द का जिक्र तक नहीं है. लेकिन हिंदी फिल्मों की कलाकार कंगना रानौत ने तय किया कि इस ट्वीट को लेकर बात किताब पर या जाति की समस्या पर नहीं, आरक्षण के बारे में करनी है. उन टिप्पणियों को कंगना रानौत के ट्विटर हैंडल पर जाकर देखा जा सकता है.

इन ट्वीट में कंगना ने मुख्य रूप से 6 विचार रखे हैं:

1. आधुनिक भारत में जातिवाद खत्म हो गया है. छोटे शहरों में भी जातिवाद नहीं है.

2. जातिवाद की समस्या अगर बनी हुई है तो इसकी वजह आरक्षण है, जिसका प्रावधान संविधान की वजह से है.

3. आरक्षण की व्यवस्था मेरिट और ज्ञान के खिलाफ है और इसकी वजह से भारत का श्रेष्ठ ज्ञान अमेरिका चला जा रहा है.

4. रिजर्वेशन भाई-भतीजावाद का ही दूसरा रूप है.

5. अमीर लोग, जो ऑडी कार चलाते हैं, उनके बच्चे भी रिजर्वेशन का लाभ उठा रहे है.

6. जाति का संबंध किसी की पहचान से नहीं है. ये व्यक्ति के गुण पर निर्भर है.

जाति की समस्या की जगह बातचीत आरक्षण पर

जाति पर चलने वाली किसी भी चर्चा को आरक्षण तक सीमित कर देना और जाति के कारण कुछ जातियों को मिलने वाले विशेषाधिकारों और बाकी जातियों के साथ जाति के आधार पर होने वाले उत्पीड़न, भेदभाव और भारत की विभिन्न संस्थाओं में सवर्ण जातियों के बेहिसाब वर्चस्व पर बात न करना वो रणनीति है, जिस पर सवर्ण जातियों के बुद्धिजीवी से लेकर आम लोग तक अक्सर अमल करते हैं.

जाति को लेकर सिर्फ आरक्षण की चर्चा करने की ट्रेनिंग सवर्ण परिवारों में अक्सर बचपन में ही दे दी जाती है. ऐसे बच्चों और बच्चियों के लिए समस्या जातिवाद नहीं, आरक्षण है, जबकि राष्ट्र निर्माताओ ने संविधान में आरक्षण का प्रावधान जाति समस्या के इलाज के तौर पर इसलिए किया है, ताकि तमाम समुदायों, खासकर सामाजिक रूप से वंचित समुदायों को राजकाज में हिस्सेदारी देकर उन्हें राष्ट्रनिर्माण का हिस्सा बनाया जा सके.

ऐसे बच्चे जब जाति की बात आने पर फौरन आरक्षण की बात करने लगते हैं और सारी समस्याओं की जड़ इसे ही बताने लगते हैं, तो दरअसल वे अपनी जानकारी में कोई झूठ नहीं बोल रहे होते हैं. दरअसल इस मसले पर उनको सिर्फ यही तर्क सिखाया जाता है. सिखाने वालों में माता-पिता, रिश्तेदार, दोस्त आदि होते हैं, जो भारतीय स्थितियों में अक्सर अपनी ही जाति या अपने ही जाति समूह के होते हैं. कंगना रानौत जाति के बारे में जो बोल रही हैं, वह इस मायने में सच है कि इसके अलावा कोई सच उनको आज तक किसी ने बताया ही नहीं है.

जाति व्यवस्था और विलकिरसन का तर्क

ऐसे लोगों का अक्सर तर्क होता है कि ‘जाति तो हमने बनाई नहीं है, न मेरे बाप-दादा ने बनाई है और हम या मेरा परिवार न तो दलितों का बलात्कार करता है, न उनको साथ छुआछूत बरतता है. ये तो बहुत पुरानी चीज है. इसलिए लिए वर्तमान पीढ़ी को जिम्मेदार ठहराना या उनसे रोजगार और नौकरियों के अवसर छीन कर किसी और जाति को दे देना कहां तक सही है.’

देश के तमाम अवसरों और नौकरियों पर अपना अधिकार मानना दरअसल एक सवर्ण ग्रंथी है, जिसकी वजह से सवर्ण समुदाय खुद को ज्यादा प्रतिभाशाली और मेरिट वाला मानता है और आरक्षण के खिलाफ खड़ा हो जाता है. ये तब है जबकि भारत की ज्यादातर संस्थाओं जैसे- उच्च न्यायपालिका, नौकरशाही, कॉरपोरेट जगत, मीडिया, कला और फिल्म आदि क्षेत्रों में अतिशय सवर्ण वर्चस्व पहले से है और इस बारे में आंकड़े मौजूद हैं.

अब एक बार फिर उस किताब की बात, जहां से ये बहस शुरू हुई है. मेरा मानना है कि अगर कंगना रानौत ने इसाबेल विलकिरसन की ये किताब पढ़ी होती, तो जाति के बारे में वे इस तरह से बात शायद न कर पातीं.

विलकिरसन की किताब दरअसल सिर्फ भारतीय जाति व्यवस्था के बारे में नहीं है. उनका मुख्य उद्देश्य अमेरिकी नस्लवाद को समझने का एक नया नजरिया विकसित करना है और उसे क्रम में वे ये बताती है कि अमेरिकी नस्लवाद को जातिवाद और जाति व्यवस्था के नजरिए से बेहतर समझा जा सकता है.

वे एक पुरानी इमारत का उदाहरण देते हुए अमेरिकी नस्लवाद की व्याख्या करती हैं और कहती हैं – पहली नजर में ये घर ठीकठाक नजर आता है. लेकिन जब इंफ्रारेड तकनीक से घर की जांच की जाती है तो उसमें कई तरह की छिपी दरारें और टूटफूट नजर आती हैं. ये घर अब यहां रहने वालों के लिए सुरक्षित नहीं है. लेकिन कुछ लोग कहते हैं कि ‘ये घर इस हाल में कैसे पहुंचा, इससे मेरा कोई लेना देना नहीं है. मैं अतीत में किए गए अपराध या पाप के लिए कैसे जिम्मेदार हूं?’ वे भूल रहे हैं ये घर बुरे हाल में है तथा इसकी हालत और खराब हो रही है. यहां रह रहे सभी लोगों को इसकी मरम्मत में जुटना चाहिए.

जाति बीमारी है और आरक्षण इलाज है

भारत में रिजर्वेशन या वंचित तबकों के लिए चलाई जा रही योजनाओं के जरिए इस इमारत की मरम्मत का काम चल रहा है. कितनी मरम्मत हो पाई है, इसका आकलन अभी होना है, लेकिन ये कहकर कि आरक्षण से जाति व्यवस्था अब तक कमजोर नहीं हुई, मरम्मत के काम को रोक देने के समान होगा.

दरअसल जाति व्यवस्था की विशेषता ये है कि हमेशा नजर नहीं आती. एक एक अदृश्य विशेषाधिकारों का झोला है, जिसमें से उपयुक्त मौके पर कोई चीज निकालकर सवर्ण लोग अपने लिए इस्तेमाल कर लेते हैं और बाकी समय में ऐसा आभास दिलाते हैं, मानो ऐसा कोई झोला उनके पास है ही नहीं.

विलकिरसन बताती हैं कि जाति भाषा नहीं, उसका व्याकरण यानी ग्रामर है. ये हमें तभी सिखा दी जाती है, जब हम बच्चे होते हैं. हो सकता है कि हमने व्याकरण की अलग से कोई किताब न पढ़ी हो, लेकिन व्याकरण पढ़े बगैर भी बच्चे बोलना सीख लेते हैं और उन्हें पता होता कि किस शब्द के बाद क्या और कैसे बोलकर बातचीत करनी है. हम बोलते वक्त व्याकरण के बारे में सोचते तक नहीं हैं, लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि हमें व्याकरण नहीं आता. यही बात जाति व्यवस्था के बारे में लागू होती है. ये होती सब जगह है, लेकिन इसका होना अक्सर नजर नहीं आता. ऐसे विशेषाधिकार अमेरिका में श्वेत लोगों को हासिल हैं, जिनके बारे में नारीवादी लेखिका पेगी मेकिंटोस ने पूरी थीसिस लिखी है कि किस तरह श्वेत लोगों के पास विशेषाधिकारों की एक पोटली होती है, जिसका वे जब चाहे, इस्तेमाल कर लेते हैं.

हालांकि भारत में सवर्ण जातियों की विशेषाधिकारों की पोटली अमेरिका की तरह अदृश्य नहीं है. भारत में जातिवाद का अक्सर बेहद क्रूर और हिंसक तरीके से इस्तेमाल किया जाता है. लेकिन खासकर विदेशों में बसे भारतीय और महानगरों में बसे लोग जाति को बारीक तरीके से अपने पक्ष में इस्तेमाल करते हैं. ऐसा कई बार अनजाने में किया जाता है, जिसकी वजह से सवर्णों में कई बार जातिवाद को लेकर कोई अपराध बोध भी नहीं होता.

विलकिरसन बताती हैं कि जाति का छिपा होना इसे ज्यादा खतरनाक और टिकाऊ बनाती है. वे कहती हैं कि नस्ल अगर चमड़ी है तो जाति हड्डी है. ये हमारे बीच के फर्क का आधार तत्व है. इसकी वजह से ही भेदभाव वाली व्यवस्था खड़ी है. ‘ये हवा की तरह है. जब इसकी रफ्तार ज्यादा हो तो ये आपको उड़ा ले जा सकती है. लेकिन सामान्य स्थितियों में ये होती तो है, लेकिन नजर नहीं आती.’ मिसाल के तौर पर जब भी कंगना को जरूरत पड़ी तो उन्होंने अपनी जाति- राजपूत की पहचान का इस्तेमाल कर लिया और बाकी समय में वे जातिमुक्त या सिर्फ भारतीय बन जाती है. कर्णी सेना ने मणिकर्णिका फिल्म रिलीज होने के समय जब विरोध किया तो कंगना ने अपनी राजपूत जाति को आगे कर दिया. अब वे कहती हैं कि वे सिर्फ भारतीय हैं.

सवर्ण समुदाय जाति का ऐसा सलेक्टिव इस्तेमाल करता रहता है. मिसाल के तौर पर लगभग हर सवर्ण बुद्धिजीवी ने 2010-2011 में जाति जनगणना का विरोध किया या लगभग हर सवर्ण ने 2019 में सवर्ण आरक्षण का समर्थन किया और फिर वे आसानी से जातिमुक्त और सिर्फ भारतीय बन गए और कहने लगे कि जाति तो अब बीते दौर की बात है.

दरअसल सुविधा के अनुसार जातिमुक्त हो जाना सवर्णों के लिए ही मुमकिन है. सतीश देशपांडे सवर्णों की इस सुविधा का जिक्र करते हुए कहते हैं कि ‘सवर्ण जातियों के लोग अपने विशेषाधिकार को कारण खुद को जातिमुक्त बता पाते हैं, लेकिन वंचित समुदायों के लोगों को अपनी जाति की पहचान को सामने लाना पड़ता है. इस वजह से जब भी जाति की बात होती है, तो उसका मतलब वंचित जातियों से लगाया जाता. इसलिए बाकी जातियों के लोगों को एससी-एसटी या ओबीसी कटेगरी के अंदर रखा जाता है और सवर्ण जातियां जनरल कास्ट बन जाती हैं.’


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